पौराणिक भारत में एक शांतनु नाम का साधू अपनी पत्नी के साथ रहता था | दोनों बहुत ही बूड़े और अंधे थे | इन दोनों का श्रवण नाम का पुत्र था | श्रवण अपने अंधे माँ बाप की सेवा में ही अपनी ज़िन्दगी व्यतीत करता था | वह अपने माँ बाप की हर इच्छा पूर्ण करता था | 

एक दिन उसके माँ बाप ने कहा की “पुत्र हम बूड़े हो गए हैं , मरने से पहले हम भारत के धार्मिक स्थल देखना चाहते हैं | श्रवण ने उनकी इच्छा पूरी करने का फैसला किया | उन्होनें अपने माँ बाप के लिए एक कांवर बनाया और वह लोग तीर्थ के लिए निकल पड़े | श्रवण अपने माँ बाप के लिए इतनी आसक्ति रखते थे की उन्हें उनका वज़न पता ही नहीं चला | वह कई दिनों तक चलते रहे | 

एक दिन वो ऐसे स्थान पर पहुंचे जहाँ का एहसास नकरात्मक था | उस जगह पहुँच उन्होनें कांवर रख कर बड़ी जोर से अपने माँ बाप से कहा , “ क्या समय बर्बादी है ! में युवा हूँ और में अपनी ज़िन्दगी आपको ले जाने में बर्बाद  कर रहा हूँ | मुझे नहीं लगता ये सही है”|

श्रवण के पिता समझ गए की इस जगह में कुछ खोट है तो उन्होनें श्रवण से कहा , “ मेरे प्यारे बेटे , यहाँ मत रुको | इससे गंग्द्वार ( हरिद्वार ) यहाँ पास में ही है | तो उस जगह पर चलो और वहां बात करते हैं “|

गुस्से में श्रवण ने कांवर उठाया और गंग्द्वार की ओर चल पड़े | जैसे ही उन्होनें गंग्द्वार में कदम रखा तो शर्म से उनकी आँखों में आंसू आ गए | उन्होनें हाथ जोड़ अपने माँ बाप से माफ़ी मांगी और कहा “ मैं नहीं जानता मुझे क्या हो गया था जो मेने आपसे ऐसे बात की | कृपया मुझे माफ़ कर दें !”

श्रवण के पिता बोले “ मेरे बेटे तुम्हारी गलती नहीं है | उस जगह की उर्जा ऐसी थी की तुम उसके प्रभाव में आ गए और ये शब्द कह दिए | इसिलए मेने तुमसे गंग्द्वार चलने को कहा”|


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