अहोम साम्राज्य १२२८ में स्थापित हुआ जब सुकफा ने ब्रह्मपुत्र घाटी में कदम रखा | सुकफा ने किसी स्थापित साम्राज्य से युद्ध नहीं किया बस दक्षिण में एक बिना आबादी वाला क्षेत्र अपना लिया जिसके उत्तर में बुर्हिदिहिंग नदी , दक्षिण में दिकहौ नदी और पूर्व में पटकी पहाड़ थे | उसने स्थानीय गुटों जैसे बरही और मरंस से दोस्ती की और अंत में चरैदेओ में अपनी राजधानी स्थापित की |

अहोम अपने साथ गीला धान की खेती की तकनीक लाये थे जो उन्होनें यहाँ के लोगों से बांटी | जिन लोगों ने अहोम ज़िन्दगी को अपनाया उन्हें अहोम ज़िन्दगी में पूर्ण रूप से ढाल लिया गया | इस प्रक्रिया के फलस्वरूप बरही गुट और नागा और मरन जैसे अन्य गुट अहोम में परिवर्तित हो गए जिससे अहोम लोगों की संख्या बढती गयी | ये बदलाव की प्रक्रिया १६ सदी तक काफी व्यापक थी जब सुहुंग्मुंग के नेतृत्व में चुटिया और कचरी के साथ साथ अन्य कई साम्राज्यों पर कब्ज़ा किया गया |

प्रम्मता सिंघ द्वारा रंग घर का अहोम राजधानी रोंगपुर में निर्माण कराया गया | रंग घर दक्षिण एशिया में सबसे बड़े स्टेडियम में से एक है | उसका फैलाव इतना ज्यादा था की अहोम बनने की प्रक्रिय सीमित हो गयी और अहोम अपने ही साम्राज्य में ही अल्पसंख्यक बन गए | इस समय हिन्दू प्रभाव महत्वपूर्ण हो गए | अहोम दरबार में अस्समीज़ भाषा ने कदम रखा और तै भाषा के साथ उसका प्रयोग होने लगा | राज्य के लोगों को पैक प्रणाली के अंतर्गत श्रेणी बद्ध किया जाने लगा जो संबंधो पर आधारित थी |इस  साम्राज्य पर बंगाल के तुर्की और अफ़ग़ान राजाओं का खतरा बना रहा पर उसने उनका बहादुरी से सामना किया | अहोम साम्राज्य ने प्रताप सिंघ के नेतृत्व में अपनी विशेषताओं को और परिपक्व बनाया | 


ये साम्राज्य 17 सदी में मुग़ल हमलों का शिकार हो गया और ऐसे ही मौके पर १६६२ में मीर जुमला के नेतृत्व में मुग़ल सेना ने उनकी राजधानी गढ़गाँव  पर कब्ज़ा कर लिया | मुग़ल उसको संभाल नहीं पाए और अंत में सरैघट की जंग के अंत में अहोम ने न सिर्फ मुग़ल हमले का जवाब दिया अपितु अपनी सीमाओं को मानस नदी तक बड़ा दिया | थोड़ी अनिश्चितता के बाद राज्य को आख़री राजा , तुन्ग्खुन्गिया राजा मिले जिन्हें गदाधर सिंघा ने स्थापित किया था |

तुन्ग्खुन्गिया राजाओं के  शासन की पहचान थी शांति और कला और निर्माण में उपलब्धियां | शासन के अंत में कई सामाजिक झगडे शुरू हो गए जिनके फलस्वरूप मोमोरिया दंगों की शुरुआत हुई | बाघियों ने राजधानी रंगपुर को कई सालों तक अपने कब्ज़े में रखा पर अंत में कप्तान वाल्श के नेतृत्व में अंग्रेजों के सहयोग से उन्हें वहां से हटा दिया गया | कमज़ोर पड़ा साम्राज्य अंत में बार बार हो रहे बर्मा से हमलों का शिकार हो गया और १८२६ में यांदाबो की संधि के बाद राज्य का नेतृत्व अंग्रेजों के हाथ में पहुँच गया | 

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