मशहूर मुगल बादशाह अकबर के दिली दोस्त और वजीर का नाम था अबुल फज़ल । अबुल फज़ल अकबर का दाहिना हाथ था । बादशाह उसकी बात बहुत मानता था । एक दिन जब बादशाह का मिजाज़ बहुत खुश था तो अबुल फज़ल ने आकर कहा

 

'जहाँपनाह! हमारी सरकार से लोग बहुत खुश हैं। उन्हें किसी तरह की शिकायत नहीं। वे कहते हैं कि अकबर जैसा रहमदिल बादशाह न इसके पहले हुआ और न आगे होगा। इस तरह लोग हुजूर की हुकूमत का बखान कर रहे हैं। लेकिन....' कहते-कहते अबुल फज़ल चुप हो रहा ।

 

‘बात क्या है? हिचकिचाओ नहीं ! साफ-साफ कह दो !' बादशाह ने कहा।

 

अबुल फज़ल ने कहना शुरू किया

 

’हुजूर ! मुझे पता चला है कि शाहजादा सलीम अनारकली नामक नाचने वाली की मुहब्बत में पड़ गए हैं। यही नहीं, मुझे यह भी मालूम हुआ है कि वे उससे निकाह करने की कोशिश में लगे हुए हैं। अगर यह बात सच हुई तो जहाँपनाह की इज्जत धूल में मिल जाएगी। उनका घराना लोगों की नजर में बहुत नीचे गिर जाएगा। इससे उनके खानदान के माथे पर कलंक का टीका लग जाएगा! न जाने, लोग इसके खिलाफ कितना हो-हल्ला मचाएँगे? इसी सोच से मेरा दिल टूक-टूक हो रहा है!'

 

उसने अपने मन का दर्द प्रगट कर दिया। उसकी बात सुन कर अकबर भी सोच में पड़ गया। आखिर उसने कहा-

 

‘फज़ल ! तुम्हारी बात पर मुझे यकीन नहीं हो रहा है। दुधमुंहे सलीम के बारे में ऐसी अफवाह किसने फैलाई है? क्या मैं अपने लड़के का मिजाज़ नहीं पहचानता ?  लेकिन तुम्हारी बात पर यकीन किए बगैर कैसे रहूँ ? तुम मुझसे झूठ नहीं बोल सकते ! खैर जो हो, पहले शाहजादे को समझा-बुझा कर देखो!'

 

दूसरे दिन रात को दीवान ए खास में अनारकली के नाच का इन्तजाम हुआ। बादशाह खुद तशरीफ ले आए। और भी बहुत से लोग आए। बादशाह के तख्त के सामने ही शाहजादे की गद्दी थी। उस गद्दी के ऊपर एक आइना लगा हुआ था। नाचने वाली की छोटी से छोटी हरकत भी बादशाह को उस आइने में साफ झलक जाती थी.। लेकिन यह बात सिर्फ़ बादशाह को मालूम थी ।

 

नाच शुरू हुआ ! अनारकली ने आकर पहले चारों ओर घूम कर सब को सलाम किया। तुरन्त वह आइने की बात भाँप गई। कायदा था कि बादशाह के सामने नाचते वक्त कभी पीठ नहीं दिखानी चाहिए। यह अनारकली को मालूम था। इसलिए वह बड़ी चतुरता से नाचने लगी। अनारकली का नाच देख कर सब लोग मगन हो गए। बादशाह खुद होश-हवास खो बैठा। अनारकली अब तक बादशाह की तरफ नज़र किए थी। उसने एक बार भी अपने प्राण-प्यारे सलीम की ओर निगाह न डाली थी।  

 

नाच खतम होने को आया। अनारकली अन्त में चक्कर लगा कर नाच रही थी। उस तरह घूमते वक्त उसने सलीम पर एक बिजली की सी मुसकान फेंक दी। वह मुसकान सिर्फ सलीम के लिए ही थी। लेकिन अकबर की पैनी नज़रों से वह बच न सकी। बादशाह ने सब कुछ देख लिया। फजल का कहना सच साबित हुआ। बादशाह ने सोचा कि अब क्या करना चाहिए।

 

फज़ल सलीम को समझा बुझा कर हार गया था। सलीम ने बे खौफ़ कह दिया था कि इस बारे में उसका मन नहीं बदल सकता। वह अनारकली को दिल दे चुका है अब उसे लौटा नहीं सकता। जबर्दस्ती करने से बात और भी बिगड़ जाती। इसलिए फज़ल चुप रह गया ।

 

लेकिन अकबर भी बड़ा हठी आदमी था! उसने फज़ल को अनारकली को समझाने भेजा! उसने जाकर कहा-

 

'बेटी ! तुम सलीम से निकाह करोगी तो सल्तनत की बुनियाद हिल जाएगी। इसलिए अपना मन बदल लो। और किसी को चुन लो। सलीम से तुम जितने धन-दौलत की उम्मीद रखती हो वह मैं तुम्हें वैसे ही दिला दूंगा।' यों उसने उसे बहुत समझाया ।

 

तब अनारकली ने जबाब दिया—

 

'वजीर साहब ! मैंने कभी सलीम से धन-दौलत नहीं चाही। मैंने उसे अपना दिल दे दिया है। मैं तो कभी की उसकी हो चुकी हूँ। मैं उसके लिए बड़ी से बड़ी कुरबानी करने को भी तैयार हूँ। इस बारे में मेरा मन नहीं बदल सकता। उसने अपना निश्चय प्रगट किया।

 

अकबर बादशाह जो बड़ा रहम दिल मशहूर था, इस मामले में बड़ा सङ्ग-दिल साबित हुआ। शाहजादे से उसे दूर रखने पर मामला तै हो जाएगा, यह सोच कर अनारकली को वह अपने साथ लाहौर ले गया। वहाँ उसने भी उसे समझाया-बुझाया । लेकिन उसका मन नहीं बदला ।

 

 

तब बादशाह ने उसे जिंदा दीवार में चुनवा डालने का हुकुम दे दिया।  राज-मिस्त्री बुलाए गए। अनारकली वहीं खड़ी थी। बस, उसके चारों ओर ईंटों की दीवार खड़ी होने लगी। दीवार क्या थी! वह उसकी जिंदा क़ब्र थी।

 

दीवार घुटनों तक बन गई।

 

'क्यों, अपना इरादा बदलती हो कि नहीं?' बादशाह ने पूछा ।

 

'नहीं' अनारकली ने मुसकुराते हुए जवाब दिया।

 

इस तरह एक एक ईंट रखते ही अकबर अपना सवाल दुहराता गया। लेकिन वह उसी तरह मुसकुराती हुई अपना अडिग निश्चय जताती गई। दीवार गले तक आई।

 

'क्यों ! अब भी अपना इरादा बदलती हो?' बादशाह ने फिर पूछा।

 

लेकिन अनारकली ने वही जवाब दिया। आखिर दीवार नाक तक आई । तब अकबर ने फिर एक बार अपना सवाल दुहराया।

 

लेकिन अनारकली ने कहा-

 

'सलीम के लिए जान देने में भी कोई हर्ज नहीं ।' गुस्से से तड़प कर अकबर ने राजगीरों को इशारा किया।

 

दीवार पूरी हुई और अनारकली जिंदा चुन दी गई। कुछ दिन बाद जब सारा हाल सलीम को मालूम हुआ तब उसका हृदय भभक उठा। लेकिन अब फायदा क्या था ? आखिर उसने अबुल फज़ल का खून करवा कर अनारकली का बदला लिया। बाप के खिलाफ बगावत का झण्डा खड़ा किया ।

तख्त पर चढ़ने के बाद उसने अपनी प्यारी अनारकली के नाम से एक खूबसूरत बाग लगा कर उस में एक कीमती यादगार खड़ी की।

 

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