इस समय रात बहुत कम बाकी थी और सुबह की सफेदी आसमान पर फैला ही चाहती थी। और लोग तो अपने-अपने ठिकाने चले गए और दोनों नकाबपोशों ने भी अपने घर का रास्ता लिया, मगर भूतनाथ सीधे देवीसिंह के डेरे पर चला गया। दरवाजे ही पर पहरे वाले की जुबानी मालूम हुआ कि वे सोए हैं परंतु देवीसिंह को न मालूम किस तरह भूतनाथ के आने की आहट मिल गई (शायद जागते हों) अस्तु वे तुरंत बाहर निकल आए और भूतनाथ का हाथ पकड़ के कमरे के अंदर ले गए। इस समय वहां केवल एक शमादान की मद्धिम रोशनी हो रही थी, दोनों आदमी फर्श पर बैठ गए और यों बातचीत होने लगी -

देवी - कहो इस समय तुम्हारा आना कैसे हुआ क्या कोई नई बात हुई?

भूत - बेशक नई बात हुई और वह इतनी खुशी की हुई कि जिसके योग्य मैं नहीं था।

देवी - (ताज्जुब से) वह क्या?

भूत - आज महाराज ने मुझे अपना ऐयार बना लिया और इज्जत के लिए मुझे यह खंजर दिया है।

इतना कहकर भूतनाथ ने महाराज का दिया हुआ खंजर और जीतसिंह तथा गोपालसिंह का दिया हुआ बटुआ और तमंचा देवीसिंह को दिखाया और कहा, ''इसी बात की मुबारकबाद देने के लिए मैं आया हूं कि तुम्हारा एक नालायक दोस्त इस दर्जे को पहुंच गया है।''

देवी - (प्रसन्न होकर और भूतनाथ को गले से लगाकर) बेशक यह बड़ी खुशी की बात है, ऐसी अवस्था में तुम्हें अपने पुराने मालिक रणधीरसिंह को भी सलाम करने के लिए जाना चाहिए।

भूत - जरूर जाऊंगा।

देवी - यह कार्रवाई कब हुई।

भूत - अभी थोड़ी ही देर हुई। मैं इस समय महाराज के पास से ही आ रहा हूं।

इतना कहकर भूतनाथ ने आज रात का बिल्कुल हाल देवीसिंह से बयान किया। इसके बाद भूतनाथ और देवीसिंह में देर तक बातचीत होती रही और जब दिन अच्छी तरह निकल आया तब दोनों ऐयार वहां से उठे और स्नान-संध्या की फिक्र में लगे।

जरूरी कामों से निश्चिंती पा और स्नान-पूजा से निवृत्त होकर भूतनाथ अपने पुराने मालिक रणधीरसिंह के पास चला गया। बेशक उसके दिल में इस बात का खुटका लगा हुआ था कि उसका पुराना मालिक उसे देखकर प्रसन्न न होगा बल्कि सामना होने पर भी कुछ देर तक उसके दिल में इस बात का गुमान बना रहा, मगर जिस समय भूतनाथ ने अपना खुलासा हाल बयान किया उस समय रणधीरसिंह को बहुत मेहरबान और प्रसन्न पाया। रणधीरसिंह ने उसको खिलअत और इनाम भी दिया और बहुत देर तक उससे तरह-तरह की बातें करते रहे।

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